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मांडू की सैर (मांडव)

 मांडू की सैर (मांडव)


मांडू की सैर  (मांडव)
मांडव का रोड मैप 

बरसात होने से चारों ओर हरियाली छाई हुई थी। हर ओर उमंग आनंद कि लहरे हिलोरे ले रही थी। ऐसे में परिवार के सभी सदस्यों ने प्रोग्राम बनाया कहीं घूमने चला जाय। अब प्रश्न था। कहां चलें। विचार मंथन के बाद सर्व सम्मति से मांडव चलने का तय किया। क्योंकि यह स्थान ऐतिहासिक के साथ  पहाड़ी क्षेत्र में बहुत ही सुंदर रमणीय स्थल है।                           

सभी अपनी अपनी तैयारी में लग गये। और हो भी क्यो न , बहुत समय बाद परिवार के साथ कार्यक्रम बन रहा था। मौज मस्ती सैर सपाटा। शहर के भीड भाड भरे वातावरण से दूर सुरम्य पर्यटन स्थल पर जाने का। 

मांडव को करीब से देखना हो तो भीड वाले दिन को छोड़कर जाने में ही मजा आयेगा। रविवार और अन्य हाली डे पर  बहुत भीडभाड रहती है। अतः इन दिनों को छोड़कर प्रोग्राम बनाया।
सभी की राय से सोमवार का दिन तय हुआ। 
सुबह 6 बजे हम लोग इंदौर से मांडव के लिये रवाना हुऐ। वहां पहुंचने के दो मार्ग है । एक धार सिटी होकर, दुसरा मानपुर होकर, सो हमने दुसरा विकल्प चुना। 

रास्ते में चर्चा हुई कि जहां जा रहे है ।उसके इतिहास के बारे में थोडी बहुत जानकारी हो तो घूमने का आनंद दो गुना हो जाता है। तो चलिये। मांडवगढ़ का संक्षिप्त इतिहास जान लेते है।

भौगोलिक स्थिती  
मांडवगढ़ समुद्र तल से 633.7 मीटर ऊंचाई पर स्थित पहाड़ी पर बसा है। पश्चिम में विशिष्ट ऊंचाई लिये हुऐ सोनगढ़ के पर्वत है।पूर्व,पश्चिम और उत्तर की तरफ से गहरी तंगघाटी से घिरा होने के कारण मालवा के पठार से अलग हो जाता है।


मांडू की सैर  (मांडव)
कांकडा खोह,मांडव

एवम पूर्व की पहाड़ी के मध्य से एक गहरी तंग धाटी है। यह करीब 13 वर्ग किमी क्षेत्र में बसा है। वर्षा काल में यहां अनेक झरने जीवित हो जाते है। 
 इसे सिटी आफ ज्वाय के नाम से भी जाना जाता है।

इतिहास 

विक्रम संवत 612 (555 ई.) के संस्कृत अभिलेख के अनुसार मंडप दुर्ग में स्थित तारापुर के पाशर्वनाथ मंदिर मे चंद्र सिंह शाह नामक सौदागर ने भगवान आदिनाथ की मुर्ति स्थापित की थी। इतिहासकार खुसरों परवींज के अनुसार (590- 628 ई.) में आनंद देव राजपुत ने निर्माण करवाया था। 

छठी शताब्दी के मध्य  इसे मंडप दुर्ग नाम से जाना जाता था। इसके बाद तीन शताब्दी तक कोई पुख्ता उल्लेख नहीं मिले। दसवीं शताब्दी में यह दुर्ग कनौज के गुर्जर प्रतिहार साम्राज्य की सीमा चौकी था।

वि.संवत 1003 (946 ई.) में सम्राट महेन्द्र पाल के अधीन था। दसवीं शताब्दी के अंत में परमार वंश के अधीन रहा। इनमे राजा मुंज ने मुंज तालाब का निर्माण करवाया। राजा भोज ने धार शहर को राजधानी बनाया तथा अपनी इष्ट वांग्देवी (सरस्वती देवी ) की प्रतिमा मांडवगढ़ में स्थापित करवाई।

सर्प बन्ध पर अंकित एक अभिलेख में वि.संवत् 1125 (1068 ई.) के अनुसार परमार राजा उदयादित्य के  अधीन भट्टारक देवेन्द्र देव  मांडू के सावंत थे। राजा उदयादित्य ने लोहानी गुफाओं और शैव मंदिर का निर्माण करवाया।  

1227 ई. में शम्मसुद्दीन अल्तमश ने विदिशा और उज्जैन को तो लूटा मगर मांडू राजा देवपाल से संधि कर ली। 1293 ई. में दिल्ली के सुलतान जल्लालुद्दीन ख़िलजी ने आक्रमण कर लूटपाट करी। 1305 ई. तक मांडू हिंन्दु   शासकों के अधीन रहा। 
अलाउद्दीन ख़िलजी  के सेनापति अइन-उल-मुल्क ने राजा महलक देव के सेनापति कोकदेव को आक्रमण कर मार दिया व गुप्तचर की सहायता से गुप्त मार्ग से दुर्ग में पहुंच कर राजा महलक देव की हत्या कर दी । इसके साथ हिंन्दु शासन का अंत हुआ।
मुहम्मद बिन तुगलक के शासनकाल में दिलावर खाँ गौरी मालवा का राज्यपाल बना। 1405 ई. में इसकी मृत्यु हो गई। इसने तारापुर  गेट और शाही क्षेत्र बनवाया।  
1405 ई. में होशंग शाह ने राज संभाला और 27 वर्ष तक राज किया। 

1435 ई. में होशंग शाह की मृत्यु के बाद पुत्र गज़नी खाॅं ने शासन संभाला। 1436 ई. में महमूद खाॅं ने गज़नी को जहर देकर मार दिया और शासन पर अधिकार कर लिया। 
खिलजी वंश के शासक महमूद शाह ने 33 वर्ष तक राज किया। 1469 ई. में महमूद की मृत्यु के बाद पुत्र गयासुद्दीन ने 31 वर्षो तक राज किया। पुत्र द्वारा जहर देने से मृत्यु हो गई।
नासिरूद्दीन ने 10 सालो तक शासन किया और तीव्र ज्वर के कारण मृत्यु हो गई। पुत्र महमूद द्वितीय ने शासन संभाला। राजपुत सरदार की बढती ताकत से वह भागकर मुज़फ्फर शाह द्वितीय की शरण गया  और फिर शासन पर अधिकार जमा लिया। किंतु मुज़फ्फर के उत्तराधिकारी बहादुर शाह से मित्रता नहीं बन पाई और 1526ई. में बहादुर शाह ने आक्रमण करके मांडवगढ़ पर अधिकार जमा लिया। 
1534 ई. में  हूमांयू ने युद्ध कर अपना अधिकार जमा लिया। 1536 ई. में कादिर शाह ने सिंहासन पर कब्जा कर लिया। 
1542 में शेरशाह का अधिकार हो गया ।
उसने शुजात खाँ को गवर्नर नियुक्त किया।
1554 ई. में शुजात खाँ कि मृत्यु के बाद सुलतान बाज़ बहादुर ने शासन संभाला। 

बा़ज बहादुर दुर्गावती के हाथो पराजित होकर संगीत साधना में लग गया ।इसी दौरान रानी रूपमती से प्रणय और विवाह किया। 
1561 ई. में अकबर के जनरल आदम खाँ से सारंगपुर के नजदीक पराजित होने पर बंदी बना लिया गया। रानी रूपमती दुश्मन के हाथों बंदी बनने से पहले हीरा निगल कर स्वाभीमान के कारण आत्म हत्या कर ली। 
1732 ई. में मराठों ने मुगल गवर्नर बहादुर को पराजित कर अपना अधिकार जमा लिया। तब से यह दुर्ग मराठों के अधीन रहा। 

कांकड़ खोह  (गहरी तंग धाटी)

इतिहास की चर्चा  करते करते हम काकड़ा खोह यानि बहुत गहरी तंग धाटी तक पहुंच गये थे। बरसात में 1200 फिट गहरी इस धाटी का सौंदर्य पूर्ण निखार पर आ गया था। नीचे देखने पर हरियाली और पेडों की लंबी श्रृंखला ने मानों जमीन को अपने आगोश में ले लिया हो।  हल्की रिमझिम बारिश से सफर का आनंद और बढ़ गया था।  सामने झरनों के तीव्र गति से धाटी में गिरने की ध्वनि और हल्की धुंध ने इस खुबसुरत नजारें को चार चांद लगा दिये थे। 
आगे गहरी खाई होने से सुरक्षा के लिये रेलिंग लगी थी। हम लोगो ने रेलिंग के पास से ही धाटी के अदभुत नजारों का लुफ्त लिया। 
यहां सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा अपना अलग ही अनुभव देता है।

 मांडू जीवाश्म पार्क           

इस पार्क में विलुप्त विशाल प्राणी डायनासोर के जीवाश्म रखे गये है। एक खोज अभियान के अन्तर्गत प्रकाशित समाचार के अनुसार धार जिले में मिले शाकाहारी और मांसाहारी डायनासोर और मगरमच्छ के जीवाश्म करीब 6500 से 10000 करोड वर्ष पुराने है। जिन्हे संग्रहित कर पार्क मे रखने का कार्य चल रहा है। यहां पर डायनासोर के अंडों के जीवाश्म रखे गये हैै। पार्क में विभिन्न डायनासोरों की आकृतियों व चित्रों के माध्यम से जानकारी देने का प्रयास किया जा रहा है। 

पार्क से अब हम लोग मांडव के लिये चल दिये। आगे पहाड़ी मार्ग घुमावदार होने के साथ कही कही सकरा भी है। मांडवगढ़ में प्रवेश करने के लिये पहला द्वार दिल्ली दरवाजा है। कहते है यहां की भौगौलिक स्थिती के मध्य नजर , किलेबंदी और प्रवेश द्वार के निर्माण से यह अभेध्य रहा।

मांडवगढ़ के बारह प्रमुख प्रवेश द्वार है। जिन्में से  दिल्ली दरवाजा, आलमगीर,भंगी दरवाजा,लोहानी दरवाजा,सोनपुर दरवाजा,तारापुर दरवाजा,भगवानीया दरवाजा,जहांगीर दरवाजा और राम गोपाल प्रमुख है

चलिये अब चलते है यहां के प्रमुख पर्यटन स्थलों पर 

 1. हिंडोला महल  :

इसकी दीवारें 77° के कोण पर झुकी हुई है। बाहर से ऐसा प्रतित होता है जैसे कोई झुला बंधा हो। इसकी बनावट अंग्रेजी अक्षर T  के आकार की है। इसमें बने कक्ष के दोनों ओर 6 मेहराब दार दरवाजे बने हुऐ है। सुलतान इसे दरबार-ए-खास के रूप में प्रयोग करता था। इसका निर्माण संभवतः 15 वीं शताब्धी में रहा होगा।

2. शाही महल और चंपा बावड़ी :

मुंज तालाब के पास ही एक महल बना हुआ है। महलों मे पहले पानी की प्रचुरता के लिये खाश इंतजाम किये जाते थे। यहां पर भी एक बावड़ी बनी हुई है। महल के नीचे बनी बावड़ी के तल तक जाता हुआ मार्ग आगे तहखाने नाम से प्रसिद्ध मेहराबदार कक्षों की भूल भूलैया में मिल जाता है। बावड़ी से महक आती थी इसलिये इसे चंपा बावड़ी नाम दिया गया था।
महल के मंडप की दीवारों को बावड़ी और मुंज तालाब के किनारों से  बडी कुशलता से जोडा गया है। जिससे गर्मीयों में भी ठंडी ठंडी वायु आती रहे जिससे कक्ष ठंडे बने रहे।

3. उजाला बावड़ी और अंधेरी बावड़ी :- 

जल स्त्रोत के दो कुऐं है एक खुला और दुसरा बंद है। दोनों मे नीचे तक जाने के लिये तोरण द्वार और सीढियां है। इसमें एक तरफ रहट लगी है तथा दुसरे किनारे जल सुरक्षा के लिये शाही पहरेदारों की चौकी। अंधेरी बावड़ी के उपर गलियारे में एक गुंबद बना है । जिससे हवा और प्रकाश अंदर तक जाता है।

4. गदा शाह का महल और दुकान :- 
 
शाही परिसर में दो भवन बने है। जो गदा शाह नामक प्रभावशाली व्यक्ति के है।

5. राम मंदिर :- 

भगवान राम को समर्पित यह मंदिर बहुत पुरातन है।

6. हाथी पोल :-

 नाहर झरोखे मे पहुंचने के पहले मुख्य प्रवेश द्वार पर हाथीयों की प्रतिमा लगी है। इसलिये इसे हाथी पोल नाम से जाना जाता है।

7. दिलावर खां की मस्जिद :-  

यह मस्जिद शाही परिवारों के लिये बनी थी। यह भारतीय इस्लामिक वास्तुकला के अनुरूप बनवाई गई है।

8. नाहर झरोखा :- 

मस्जिद के पास ही बाध की आकृति का एक झरोखा बना है। जहां आकर राजा अपनी प्रजा को दर्शन देता था।

9. जहाज महल:-  

 मूंज्ज और कपूर तालाब के मध्य बने इस महल की बनावट ऐसी है। मानो कोई जहाज लंगर डाले खडा हो। महल का आगे का भाग करीब 121 मी. और चौड़ाई 15.2 मी. है 

10. तवेली महल  :

  इस महल के नीचे वाले भाग में अश्वशाला थी और उपर पहरेदारों का आवास।

11. होशंग शाह का मकबरा :- 
 संगमरमर के गुंबद वाला मकबरा बना है।

 12. जाली महल  :-  

 सागर तालाब के उपर की तरफ पहाड़ी पर बना है। यह महल । पास ही इको पाईंट भी है।

13. रेवा कुंड  :-  

जल संचय के प्रमुख स्तोत्र के रूप में बनाया गये इस कुंड में नीचे तक सीढियां बनी हुई है। 

14. बाज बहादुर का महल  :- 

  पहाड़ी ढलान पर खुबसुरत वादियों के बीच महल के प्रवेश द्वार तक चालीस सीढियां चढ़ना पडती है। अंदर दोनों तरफ संतरियों के कमरे के सामने से गुजर कर महल के बाहरी प्रांगण में पहुंच जाते है। इसके चारों ओर कक्ष बने हुऐ है। तथा मध्य में एक सुंदर कुंड । महल की बनावट बहुत ही सुंदर बनी हुई है। छत पर दो सुंदर बिरादरियां बनी हुई है। जहां से आस पास के सुंदर नजारों को निहार सकते है।

15. रूपमति का मंडप   :-   

बाज बहादुर के महल के पीछे पहाड़ी के ऊंचे शिखर पर एक महल बना हुआ है।यह पहाड़ी ढलान 365.8 मी. की खडी चट्टान पर बनाया गया है। निचली मंजिल में आर पार छतों के सहारे मेहराबदार दरवाजे बने है। पश्चिम में एक बडा कुंड है। जिसमें मानसून के पानी को एकत्र करने के लिये नालियां बनी हई है। 
महल के उपर मण्डप बने है। जो कि नीचे से वर्गाकार और उपर अर्द्ध गोल गुंबद है।  रानी रूपमति यही से मां नर्मदा के दर्शन करती थी। कहते है कि रानी रूपमति प्रतिदिन मां नर्मदा नदी के दर्शनों के पश्चात ही भोजन ग्रहण करती थी। 
इस मंडप से मांडू की वादी और निमाड़ के मैदानी इलाकों के मनोहारी दृश्य बहुत खुबसुरत लगते है।


बाज बहादुर और रूपमति का प्रेम:-

रानी रूपमति बेहद खुबसुरत और एक अच्छी गायिका थी। जब बाजबहादुर ने इनके बारे में चर्चा सुनी तो उसने विवाह प्रस्ताव भेजा जिसे रूपमति ने अपने स्वजनों के हित के लिये स्वीकार कर लिया । आगे चलकर ये प्रणय अमर प्रेम बन गया।

16. नीलकंठ मंदिर :- 

धाटी के छोर पर बनाया गया यह मंदिर प्राकृतिक दृश्यों से परिपूर्ण है। मंदिर में जाने के लिये सीढियां बनाई गई है। नीचे उतरने के बाद मध्य में सुंदर कुंड के पास से होकर मंदिर में प्रवेश करते है। अंदर शिवलिंग पर अविरल जल की धारा बहती है। मंदिर के कक्ष  अर्द्ध गुंबदी है। यहां आकर परम शांति मिलती है। 

  1. अन्य दर्शनीय पर्यटन स्थलों में 
  2. अशर्फी महल
  3. जामी मस्जिद
  4. छप्पन महल
  5. लौहानी दरवाजा
  6. लौहानी गुफाऐं
  7. लाल बंगला
  8. दरिया खां का मकबरा
  9. लाल सराय
  10. मलिक मुधीर की मस्जिद
  11. दांई की छोटी बहन का महल
  12. दांई का महल प्रमुख है।

पर्यटन का सबसे अच्छा समय मानसून का है। चारों ओर हरियाली के साथ ही झरने सजीव हो उठते है।

यहां पहुंचने के लिये सडक मार्ग से इंन्दौर , धार ,महू ,धामनोद और रतलाम से सीधे पहुंचा जा सकता है।
निकटतम रेल्वे स्टेशन इन्दौर व महू है।

वायु मार्ग के लिये नजदीकी एयरपोर्ट इन्दौर है।  

ठहरने के लिये विश्राम गृह और बजट होटल उपलब्ध है। यहां का प्रसिद्ध भोजन दाल बाटी है। मांडू की इमली दूर दूर तक प्रसिद्ध है। कुछ विशेष मौसमी फल जैसी खिरनी व सीताफल भी मांडू क्षेत्र के प्रसिद्ध है।

पुरा दिन कैसे बीत गया पता ही नहीं चला ,दिन भर सबने बहुत आनंद लिया। सुबह सबने केवल नाश्ते से ही काम चलाया अब शाम को भुख सता रही थी । जल्द ही रेस्टोरेंट की ओर चल दिये।  प्रति वर्ष दिसंबर में मांडू उत्सव का आयोजन होता है। इसमे कई कलाकार भाग लेते है। कई तरह के खेल आयोजित होते है । करीब सप्ताह भर चलने वाले इस आयोजन मे बहुत गहमा गहमी रहती है।

मौका मिले तो मांडवगढ़ एक बार अवश्य आना चाहिये।  

                                                         जय श्री कृष्ण






          
  

     


लाक डाऊन के बाद का पहला सफर

लाक डाउन के बाद का पहला सफर



कोरोना वायरस
कोरोना वायरस 


जनवरी माह में न्यूज चैनलों से मालूम चल रहा था कि कोई खतरनाक वायरस चीन की धरती से जन्म लेकर पुरी दुनिया में फैल रहा है। और इस वायरस के सामने बडे बडे सम्पन्न देश भी बेबस हो रहे हैं। 
धीरे धीरे मौत का आंकडा भी बढने लगा था। फरवरी महिना भी इसी तरह बीता मार्च के प्रथम सप्ताह में कोरोना ने भारत में भी दस्तक दे दी थी। मगर दुसरे सप्ताह में दक्षिण में पहली मौत के बाद 22मार्च को पुरे दिन लाक डाउन की पहली रिहर्सल ने समझाया कोरोना और लाक डाउन का संबंध ।  
अभी पुरी तरह से तैयार हुऐ भी नहीं थे की 23 मार्च से पुरी तरह लाक डाउन की घोषणा ने सब समझा दिया।  बाजार बंद, बसे बंद ,लोक परिवहन सेवाऐं बंद अब हम पुरी तरह से समझ गये कि लाक डाउन क्या होता है।
घर में कैद होकर रहना। ता जिंदगी यो घर पर रहे नहीं अब बाहर निकलना बंद। सात दिनो के बाद बेचैनी बढने लगी। यहां तक की डाक्टर भी उपलब्ध नहीं । शहर के सारे अस्पताल भी बंद। अब सब समझ आने लगा था। कभी ऐसा भी हो सकता है। बिना युद्ध के ही एक साथ कई देशों पर दबाव बनाना ।
 घर में रहकर प्रतिदिन न्यूज पर कोरोना  बीमारी और उसके प्रभाव तथा पीड़ित रोगी की विडीयो ने हमें अंदर तक भयभीत कर दिया था। हर पल डर के सायें में जीने लगे। बाहर निकलते ही  घबराहट कहीं कोरोना न हो जाये। हर चिर परिचीत भी शंका के दायरे में आ गया था।

 सब्जीवाले और न्यूज पेपर वाले से भी डर लगने लगा था। कोई भी वस्तु लेने से पहले सेनेटाईंज करना, हाथ धोना अनिवार्य हो गया था। खुला दुध लेने में डर का माहौल बना था। पैक चीजों पर ही विश्वास करने लगे थे।  किराना लेने जाने की झंझट खत्म आर्डर करो और सामान घर पहुंच सेवा मगर बिना मोलभाव व गुणवत्ता के।

एक सप्ताह  निकल जाने के बाद इन्दौर से फोन आया कि मम्मी जी की तबियत खराब है। अब जाये तो जायें कैसे । 
किसी तरह खोज खबर निकाली और  एस डी एम  आफिस में पता किया कैसे जा सकते है। वहां से पुरी प्रर्किया समझी तो 70% हिम्मत जवाब दे गई। उस पर इन्दौर में बढते मरीजों की संख्या ने और मुसीबत बढा दी। खैर अब केवल मोबाईल पर हाल चाल पुछने के अलावा कोई रास्ता नहीं था।  किसी तरह दो माह तक हर दिन हर पल जीवन का अहसास ले डर के साये में जी रहे थे। मजबुरी ऐसी की चाहकर भी कुछ नहीं कर सकते थे। 

आखिर जून के दुसरे सप्ताह तक छुट मिलने लगी तो हमने भी इन्दौर जाने के लिये मन बना लिया। जरूरी सामान के साथ मास्क और सेनेटाइजर भी साथ लिया। 
सडकों पर नजारा बडा विचित्र था। केवल बसें नहीं चल रही थी ।मगर हर कोई अपने अपने उपलब्ध साधन से चला जा रहा था। सारी शोशल डिस्टेंसिंग गायब बाईक पर तीन तीन और कार में छः सवारी से कम नहीं । रफ्तार इतनी के बस चंद मिनटों में मुकाम तक पहुंचने की जद्दोजहद।  लाक डाउन में प्रदुषण, अपराध, एक्सीडेंट का जो ग्राफ नीचे चला गया था अब तेजी से बढने लगा था।   

मार्ग में कभी आबाद रहते होटलों पर इक्का दुक्का वाहन ही रूके थे। सडकों पर भीड थी मगर हर कोई दौड़ रहा हो रूकने की किसी को फुर्सत नहीं थी।  किसी तरह इन्दौर पहुंचे। 

यहां गाड़ियों की चेकिंग के साथ मास्क न पहनने वालों पर कार्यवाही हो रही थी। लंबी लाईन में लगना पडा। पुरे एक धंटे के बाद हमारा नंबर आया । व्यवस्था चाक-चौबंद मगर हर कार्य के लिये सरकार पर निर्भर नहीं हो सकते हमें भी जागरूक होना होगा। या यों कह सकते है। भविष्य में होने वाली कोई अप्रिय धटना कि रिर्हसल हो।
  इन्दौर में कहीं खुला कहीं बंद का मिला-जुला असर दिखाई दे रहा था। मगर हां भविष्य कैसा होगा इसकि तस्वीर उभरने लगी है। 
क्या आप भी महसुस करते है। इस तरह की आपदा के लिये कोई फुल प्रुफ प्लान हो। तो अपनी राय शेयर करें।

                                      घन्यवाद 

    

नर्मदा नदी के मध्य एक टापू बिल्लवामृतेश्वर, धरमपुरी,मप्र

10 मार्च 2020                                                                                                                                             

नर्मदा नदी के मध्य एक टापू  बिल्लवामृतेश्वर महादेव  , धरमपुरी                                                                                            


नर्मदा नदी के मध्य एक टापू बिल्लवामृतेश्वर, धरमपुरी,मप्र
बेंट संस्थान ,धरमपुरी,मप्र
  

आप सभी को नमस्कार, साथियों आज हम बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान पर जाने के लिये घर से रवाना हुए है यह स्थान अति प्राचीन होने के साथ ही कई महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक घटनाओं को संजोए है। हम  घर से जल्द ही रवाना हो गये थे स्थान तो ज्यादा दूर नही था मात्र 45 मिनट का रस्ता था और  नर्मदा नदी मे स्नान का लाभ भी लेना चाहते थे ,घर से निकले किन्तु पुल पर जाम लगा था सो रूकना पडा ,एक ट्राला बीच पुल पर खराब हो गया था न जाने कब रास्ता खुलेगा । कुछ देर इंतजार के बाद दुसरे रास्ते से रवाना।
  8.45 बजे हम लोग धरमपुरी पहुंच गये थे।यह स्थान धार जिले के अन्तर्गत आता है। बाम्बे आगरा रोड पर खलघाट से करीब 11 किमी अन्दर की ओर मनावर रोड पर स्थित है।

जिस स्थान पर हम जा रहे है वह नर्मदा नदी की धारा के मध्य टापू रूप मे उभरा हुआ है,करीब 3किमी लंबा और 650मीटर चौड़ा भू भाग है इस स्थान पर आने के लिये जब पानी कम हो तो पुल व ज्यादा हो तो नाव से आना होता है ।धरमपुरी ग्राम किनारे पर स्नान की कोई विशेष व्यवस्था नहीं है किन्तु थोडा आगे जाने पर नहाने के लिये ठीक जगह थी, कभी कभी नदी स्नान करने का मजा बडा रोमांचकारी होता है।

  किनारे पर ही ग्यारह लिंगी महादेव का मंदिर है कहते है यह स्वयंम प्रकट हुई थी।पुजा अरचना करने के बाद नाव से ही बेंट संस्थान जाना पडा, पानी ज्यादा था ।यह टापू नर्मदा नदी की दो धाराओं के मध्य मे है।बारिश मे यह स्थान बडा मनोहारी लगता है मगर तेज धाराओ के मध्य से जाना भी जोखिम भरा है।नाव मे हमारे एक साथ यही के रहवासी मित्र ने धरमपुरी ग्राम के बारे मे बडी ही रोचक जानकारियां दी । कहानी कथाएं तो बहुत सी है किन्तु प्रमुख व ऐतिहासिक जानकारी, यहां आप से शेयर कर रहे है।

नर्मदा नदी के मध्य एक टापू बिल्लवामृतेश्वर, धरमपुरी,मप्र


 इस स्थान से दो बडी ऐतिहासिक व पौराणिक कथा जुडी है एक है रानी रूपमती की व दुसरी महर्षि दधीचि की । 

 यहां के राजा थान सिंह की सुपुत्री रूपमति बहुत ही खुबसुरत थी उसके रूप की चर्चा जब मांडव के सुलतान बाजबहादुर के कानो तक पहुंची तो उसने विवाह प्रस्ताव भेजा किन्तु रूपवती ने विवाह से पहले शर्त रखी कि वह रोज नर्मदा नदी के दर्शन से पुर्व कुछ भी ग्रहण नहीं करती है अतः ऐसी व्यवस्था हो की रोज दर्शन हो सके ।बाजबहादूर ने रानी के लिये मांडू मे महल बनवाया जहां से रोज दर्शन करती थी ।बेंट मे एक दीप स्तम्भ भी बनवाया जहां पर पुजा अर्चना के बाद दीपक लगा दिया जाता था शाम को रानी दीप दर्शन करती थी 


नर्मदा नदी के मध्य एक टापू बिल्लवामृतेश्वर, धरमपुरी,मप्र
 बिल्लवामृतेश्वर महादेव , धरमपुरी,मप्र

दुसरी कहानी है महर्षि दधीचि की, पौराणिक कथानुसार जब देव और दानवों मे संघर्ष हुआ तो दानवों का पलडा भारी पड़ने लगा, तब देवो को ऐसे हथियार की आवश्यकता पड़ी जिससे असुरों का संहार किया जा सके ,उस समय महर्षि दधीचि ने अपनी अस्थियां से बने शस्त्रों से देवो की विजय मिली । कहते है आज भी वहां पर महर्षि दधीचि की तपस्थली के प्रमाण मिलते है हम इतनी बारिकी मे नहीं  गये । 

नर्मदा नदी के मध्य एक टापू बिल्लवामृतेश्वर, धरमपुरी,मप्र
 बिल्लवामृतेश्वर महादेव  नागदेव , धरमपुरी,मप्र


 नाव से उतर कर कुछ सीढियां चढनी पड़ी तब प्रवेश द्वार दिखाई दिया ,द्वार के अंदर की ओर  चारो ओर धने पेड़ है हर तरफ हरियाली ही हरियाली और शांति, बीच मे से रास्ता बिल्लवामृतेश्वर महादेव के मंदिर को जाता है हर शिवरात्री को भीड लगी रहती है

बेंट वाले स्थान को रेवा गर्भ यानि नर्मदा का गर्भ भी कहते है ।

नर्मदा नदी के मध्य एक टापू बिल्लवामृतेश्वर, धरमपुरी,मप्र
 बिल्लवामृतेश्वर महादेव मंदिर , धरमपुरी,मप्र


यहां पार्टी के लिये बहुत ही अच्छा स्थान है साथियों अब शाम होने वाली है सूरज देव भी अस्ताचल की ओर है हमे भी चलना चाहिये वैसे भी शाम के वक्त थोडा ध्यान से ही चलना यहां बहुत अधिक सांप है मगर आश्चर्य अभी तक एक भी सर्प दंश की घटना नही हुई

साथियों हमारी अगली यात्रा गुजरात से है चलो चले मां अंबे के धाम चलो चले मां अंबे के धाम जो कि एक शक्तिपीठ भी है। और मां का भव्य मंदिर भी है।
                                                                   

                                                                             जय श्री कृष्ण 

महेश्वर यात्रा

9 मार्च 2020,  

                   महेश्वर यात्रा 

                   
महेश्वर यात्रा
महेश्वर घाट 
   

दोपहर करीब 1.00बजे महेश्वर  पहुंचे,  ओंकारेश्वर से यहां की दूरी 66 किमी और एनएच 3 से 22         किमी है ,यह खरगोन जिले मे नर्मदा नदी के उतर तट  बसा है इसे होलकर राजवंश ने राजधानी के     रूप मे  विकसित किया, महारानी अहिल्या देवी यही दरबार लगाती थी। आज भी उनके जमाने का   किला, राजगद्दी, पालकी, और कई अन्य सामग्री संजो के रखी गई है।  बगीचे में अहिल्याबाई होलकर की मुर्तिकार इतनी सजीव लगती है ।मानो अभी बोलने  लगेगी ।                                                                 

महेश्वर यात्रा
अहिल्याबाई होलकर

किले से ही नर्मदा नदी पर जाने के लिये भव्य घाट बना है। घाट से नर्मदा का पवित्र दर्शन कर कृतार्थ हो गये। भव्य मगर शांत जल धारा अपने ही वेग में बह रही है।                                                                                                


महेश्वर यात्रा
नर्मदा नदी का विहंगम मनमोहक दृश्य 

हम सीधे घाट पर ही गये, गाडी ले जाने का मार्ग है। अब नदी पर जाये तो स्नान का अपना ही अलग मजा है। पास ही मछलियों को खिलाने के लिये आटे की गोलीयां मिल रही थी हमने भी एक पैकेट खरीद लिया। ज्योंहि दाना पानी में डाला एक बडा सा झुंड इकठ्ठा होने लगा। अब हम जिधर दाना डालते  झुंड उधर ही दौड़ लगाता। मछलियों का उछल कुद देखकर बडा आनंद आ रहा था।




महेश्वर यात्रा
महेश्वर घाट 

घाट पर घंटो बैठे रहो मन नहि भरता, यहां से नाव द्वारा सहस्त्र धारा और नदी के बीच स्थित शिव मंदिर के लिये जाते है । महेश्वर के किले मे आज भी राजवंश के समय का सामान संजो के रखा है । चलिये किले मे चलते है


विठ्ठो जी की छत्री

महेश्वर यात्रा
विठ्ठो जी की छत्री

किले मे मंदिर और गलियारे है जो देखने योग्य है कुछ झरोखे बहुत खुबसुरत जहां बैठकर एक अलग ही अनुभुति होती है ।आप शब्दो से ज्यादा आनंद, तस्वीरो से लगा सकते है रजवाड़ों की शानोशौकत, हमने उन जगहों पर फोटो ली और अनुभव किया उस समय के कालखंड को।


महेश्वर यात्रा
महेश्वर किला

किले में खुबसूरत नक्काशी और पत्थर से बनी जालियों का उपयोग बहुत हुआ है। जगह जगह आकर्षक झरोखें बरबस मन मोह लेते है



महेश्वर यात्रा
महेश्वर किले के झरोखे 

यूं तो बहुत सारे फोटो है मगर कुछ यहां शेयर किये है किला बहुत ही खुबसुरत बना है।


महेश्वर यात्रा
किले से घाट पर जाने का गेट
 

ख़ासकर  शाम को नर्मदा नदी के तट पर जब सूरज देव प्रस्थान कर जाते है तब सब ओर शांति और नदी का संगीत मंत्रमुग्ध कर देता है दूर दिये टिमटिमा रहे है कही कोई भजन गा रहा है चलिये किले के अंदर की खास बाते शेयर कर ले, यहां पर जगत प्रसिद्ध महेश्वर की कलात्मक साडी जोकि हैंडलूम पर बनाई जाती है बेहद सुन्दर लगती है आप उन्हे अपने सामने बनते हुऐ भी देख सकते है और यदि पसंद आये तो सेल काउंटर पर खरीद भी सकते है ।किले के प्रवेश द्वार पर एक बहुत लंबी और वजनी तोप रखी हुई है ।


महेश्वर यात्रा
भारीभरकम तोप


सामने ही अहिल्याबाई  का दरबार हाल है  जहां पर वे राज संबधी कार्य और चर्चा करती थी वही पर एक छोटा सा तत्कालीन वस्तुओ और तस्वीरो का संकलन है जो कि इतिहास बताता है हां पास ही मे राज परिवार के अराध्य का मंदिर है जहां आज भी ठोस स्वर्ण और चांदी की प्रतिमाऐं है । किले से बाहर आकर चाय नाश्ता करके कुछ प्रमुख मंदिर है जहां जा रहे है वैसे भी समय अधिक हो रहा है । हां समय रहे तो ये मंदिर अवश्य देखे


  1. श्री राज राजेश्वरी मंदिर
  2. श्रीअहिल्या बाई मंदिर
  3. पंढरीनाथ मंदिर
  4. गणेश मंदिर
  5. रणजीत हनुमान
  6. जलेश्वर मंदिर और जगन्नाथ धाम

समय भी काफ़ी हो गया था और डिनर के लिये रेस्टोरेंट तलाश रहे थे फिर सोचा कि क्यो न पास ही धामनोद है और वहां सभी सुविधाएं उपलब्ध है मात्र 35 मिनट मे हम लोग धामनोद पहुंच गये वहां भोजन कर के देर रात  घर पहुंचे......   

हमारा अगला पडाव बहुत ही खुबसुरत जगह है नर्मदा नदी के मध्य एक टापू पर होगा। बहुत सारे साधू संतो की तपोभूमि रही है।

                                                                           
                                                                                        जय श्री कृष्ण 

ओंकारेश्वर यात्रा -2


ओंकारेश्वर यात्रा  भाग -2 

मंदिर के पास ही छोटा सा बाजार है। जहां पर पुजन सामग्री देवी देवताओं की मुर्ति , शंख , धंटी तथा मालाओं की दुकानें सजी हुई थी। कही कहीं पर चाय नाश्ते की दुकानें भी थी। हम एक बार पुरे बाजार में घुम आये।  एक दुकान पर कुछ शंख देखे। कई तरह के शंख देखने व बजाने के बाद एक खरीद लिया।
बाजार के पास से ही नाव धाट पर जाने का रास्ता है सो हम नाव धाट पर चल दिये।  रास्ते में एक दृश्य देखकर लगा कि मां नर्मदा के सम्मान में दोनों तरफ पहाड अभिवादन के लिये खडे हो। ओंकारेश्वर में ज्योतिर्लिगं और शिवालय दोनो नर्मदा नदी के अलग अलग तट पर है। 

औंकारेश्वर यात्रा -2
नया पुल 

ज्योतिर्लिंग जाने के लिये पैदल यात्रियों दो पुलों से जा सकते है। एक नव निर्मित है व दुसरा पुराना पुल 

औंकारेश्वर यात्रा -2
पुराना पुल 

यह पुल बहुत पुराना बना हुआ है। पहले इस पर से ही मंदिर आना जाना होता था। किन्तु अब नया पुल बन जाने से अधिकतर इसे ही काम में लेते है। 


औंकारेश्वर यात्रा -2
ममलेश्वर शिवालय 

अब तक भोजन का समय भी हो गया था और कुछ देर विश्राम करने के लिये  जगह देख रहे थे ।बाजार मे बहुत सारे भोजनालय है  यहां का प्रसिद्ध भोजन है                                                                                
दल बाटी 
 

   भोजन के बाद विश्राम के लिये गेस्ट हाऊस गये ।  शाम पांच बजे पैदल ही घूमने निकले बाजार मे अधिकतर पुजन सामग्री की दुकानें  मिली ।
घूम फिर कर घाट पर आ गये, यहां पर बैठना बडा सकून भरा लग रहा था मंदिर के धंटो की ध्वनि और नदी की कलकल मे जैसा सारे शोर विलुप्त हो गये थे । 
शाम को मां नर्मदा की आरती देखने का शौभाग्य मिला।  

पैदल ऊंकार पर्वत की परिक्रमा    

सुबह जल्दी परिक्रमा के लिये चल दिये। साथ में थोडा खाने का सामान और एक जोडी कपडे ले लिये थे। नर्मदा कावेरी संगम पर पहुंच कर नर्मदा में नर्मदे हर की जय धोष के साथ डुबकी लगाई। नहाने के बाद एकदम तरोताजा हो गये। परिक्रमा पथ पर वन्य  पशु पक्षी मिलते हैं।जिन्हे दाना डालने पर बडी संख्या में चूगते देख बडा अच्छा लगता है। बंदरो को चने बहुत प्रिय होते है। चने देख बडी संख्या में आ जाते है। परिक्रमा पथ 7 किमी लंबा है।इस पथ पर बहुत 


                 औंकार पर्वत 

 सारे मंदिर ,स्तंभ व मुर्तियों के दर्शन होते है। अधिकांश मार्ग जंगल से गुजरता है। चारों ओर हरियाली

 और भक्तो की  जय धोष के साथ  बंमबंम महादेव ,हर हर महादेव की लयबद्ध संगीत लहरी  में हम परिक्रमा कब पुरी हो गई पता ही नहीं चला। 

ओंकारेश्वर कहां और कैसे जाये 

यह सडक मार्ग से चारों तरफ से जुडा है।    

  1. ओंकारेश्वर रोड ( मोट्टका)     12 किमी
  2.  सनावद                              13 किमी
  3. खंडवा                                70 किमी
  4. इन्दौर                                 78 किमी
  5. धामनोद                              79 किमी
  6. उज्जैन                              138 किमी                                                                                           नजदीकी एयरपोर्ट इन्दौर है।                        रेलमार्ग से खंडवा और अजमेर- खंडवा लाईन पर (मोट्टका  ) ओंकारेश्वर रोड स्टेशन मात्र 12 किमी की दूरी पर है।                 

                

                                                                  हम अहिल्याबाई की नगरी महेश्वर यात्रा  मे मिलेंगे                              

                                                                                   धन्यवाद 

                               

                                                                                      शुभ रात्री       










ओंकारेश्वर यात्रा


हमारी ओंकारेश्वर यात्रा      

बडे दिनो बाद एक संयोग बना,मन ओंकारेश्वर जाने का कर रहा था।मगर कुछ न कुछ अडचनो के चलते जा नहीं पा रहे थे।अचानक गुजरात से मौसी जी का परिवार के साथ आगमन हुआ, बहुत समय बाद आई थी ,परिवार मे मेल मिलाप के बाद शाम को चर्चा हुई कि औकारेश्वर यहां से कितनी दूर है व कैसे जाये ।मैने उन्हें सारी जानकारी दे दी,मगर उनका आग्रह था कि आप दोनो भी साथ चले तो ज्यादा अच्छा रहेगा कहीं कोई तकलीफ़ नहीं  होगी ,हम भी तैयार हो गये।कार्यक्रम बना और तय हुआ कि सुबह जल्दी चला जाय।

8 मार्च ,सब जल्दी उठे।

 हम भी कार की सफाई मे लग गये ।                                               


ओंकारेश्वर यात्रा
यात्रा रथ

  6 बजे औकारेश्वर के लिये रवाना हुऐ, सब बडे खुश थे और बहुत दिनो बाद मुलाकात हुई थी  तो बातचित का सिलसिला जो चला तो कब खलधाट टोल पहुंच गये पता ही नहीं चला। टोल गेट पर बहुत लंबी लाईन लगी थी हमारी गाडी मे फास्ट टैग नहीं होने से केश वाली लाईन मे ही लगना पडा करीब पौन घण्टे के बाद हमारा नंबर  आया।  8.15 बजे धामनोद पहुंचे यहां पर चाय नाश्ते के लिये रूके, सुबह सुबह कचौरी, समोसा और पोहे का गर्म गर्म नाश्ता लुभा रहा था । हम सबने भी नाश्ता किया ।                                                                                                                                              करीब 11.15 बजे औकारेश्वर पहुंच गये।                                                                                          

     
कार पार्क करके सीधे नाव धाट पहुंचे


ओंकारेश्वर यात्रा
नाव से ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग की ओर

धाट पर नाव वालो से मोल भाव किया  एक नाव वाले से 75/प्रति सवारी सैर और दर्शन कराकर वापस यही पर छोड़ना का तय हुआ।                                
 हम नर्मदा नदी किनारे नौका से चक्रतीर्थ गये।वहां स्नान करके फिर ओंकारेश्वर दर्शन के लिये आये।
दुसरे किनारे सीढियां चढकर मंदिर के प्रवेश द्वार पर पहुंचे । फूल की दुकानें सजी थी एक दुकान से फूल लिये और वही पर अपने चरण पादुका उतार दिये।

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग

मंदिर में प्रवेश करने पर सबसे पहले पंचमुखी गणेश जी के दर्शन होते है। उसके बाद प्रथम तल पर ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग है। यह शिखर से विलग एक ओर विराजित है। पास ही मां पार्वती विराजित है। दुसरे तल पर महाकालेश्वर तीसरे तल पर सिद्धनाथ चौथे तल पर गुप्तेश्वर और पांचवे तल पर ध्वजेश्वर लिंग स्थापित है। प्रथम दो तलों तक छत है।बाकी खुले में मंदिर बना है। पहले दो तलों पर नंदी विराजित है। जिसमें प्रथम तल पर नंदी की मुर्ति के हनु के नीचे एक स्तंभ दिखाई देता है। जो सबसे विलग है। ओंकारेश्वर के साथ मां नर्मदा का भी महत्व है
ओंकारेश्वर तीर्थ में 24 अवतार ,माता धाट, मार्कण्डेय शिला,धावडी कुंड,सीता वाटिका,विज्ञान शाला,बडे हनुमान,सन्यास आश्रम,अन्नपूर्णा आश्रम, खेड़ापति हनुमान,गायत्री मंदिर,ओंकार मठ,माता आनंदमयी आश्रम, ऋणमुक्तेश्वर महादेव,सिद्धनाथ गौरी, आड़े हनुमान,गायत्री माता मंदिर,चांद-सूरज दरवाजे,विष्णु मंदिर,बंध्धेश्वर महादेव,गजानन महाराज,नरसिंह टेकडी,कुबेरेश्वर व चंद्रमोलेश्वर महादेव मंदिर है।  मान्धाता टापू करीब 4 मील लंबा व 2 मील चौड़ा है। 


औंकारेश्वर परिक्रमा का बहुत महत्व है। किन्तु इसके लिये एक दिन यहां रूक कर अगले दिन प्रातः काल में मान्धाता पर्वत जिसे ओंकार पर्वत भी कहते है ,के चारों ओर यह दो प्रकार से होती है। एक नाव से तथा दुसरी पैदल । किन्तु पैदल परिक्रमा में बहुत सारे मंदिर संगम स्थल आते है। परिक्रमा करने पर मन को असीम शांति के साथ प्राकृति नजारे भी देखने को मिलते है। रास्ते में राजा मान्धाता का महल भी दिखाई देता है।

मां नर्मदा नदी

अति पूजनीय पुर्व से पश्चिम की ओर बहने वाली यह नदी के बारे में कहा जाता है कि एक बार दर्शन से ही वह सारा पुण्य प्राप्त हो जाता है । जो कि गंगा ने कई बार स्नान से मिलता है।
यहां से पुनः सीढियां चढकर दर्शन वाली लाईन मे लगे । किस्मत से लाईन ज्यादा लंबी नहीं थी जल्द ही दर्शन हो गये । बाहर आकर  उपर मंदिरो के दर्शन के लिय पुनः कुछ सीढियां चढनी पड़ी ।


ओंकारेश्वर यात्रा
मां नर्मदा नदी

 यहां से नदी और औकारेश्वर का मनोहारी दृश्य देखने को मिलता है ।
 नौका सेर के समय हमने नाविक से यहां के बारे में  पुछा तो उसने अपनी ही शैली में एक कथा सुनाई।

ओंकारेश्वर यात्रा
नाव से नर्मदा परिक्रमा

कथा    

यहां के राजा मान्धाता बहुत बडे शिव भक्त थे। एक बार उन्होने इस पर्वत पर जहां ओंकारेश्वर विराजित है बहुत कठोर तपस्या करी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर शिव जी ने वर मांगने को कहा। तब राजा मान्धाता ने शिव जी से यहीं पर विराजित होने का वर मांग लिया। भगवान शिव जी ने तथास्तु कह स्वयंम प्रकट लिंग रूप में विराजित हुऐ। 


ओंकारेश्वर यात्रा
महादेव जी की पालकी

एक अन्य कथा के अनुसार कुबेर जी ने शिवलिंग स्थापित उनकी पुजा अर्चना करके प्रभु को प्रसन्न किया था।वरदान में उन्हे देवों का धनपति बनाया।  कुबेर के स्नान के लिये शिवजी ने अपनी जटा के बाल से कावेरी नदी उत्पन्न की जो नर्मदा-कावेरी संगम पर मिलता है । 

आस्था 

ओंकारेश्वर यात्रा
महादेव का भव्य त्रिशूल 

देवी अहिल्याबाई होलकर की ओर से प्रतिदिन 18 सहस्त्र शिवलिंग तैयार करके नित्य पुजन किया जाता था। और उन्हे नर्मदा नदी में प्रवाहित किया जाता था।
हर हिन्द आस्था रखने वाला एक बार अवश्य ही आना चाहता है। वैसे भी ज्योतिर्लिंगों में चौथे स्थान पर स्मरणीय इस मंदिर पर हर तीर्थयात्रा की पूर्णता मानी जाती है।
मित्रों अगले अंक में नौका से  ओंकारेश्वर यात्रा परिक्रमा और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी साझा करेगें।

              

                           शुभरात्री

                         जय श्री कृष्ण


क्रमशः..........

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